कोऽहं?
इंटरनेट पर विभिन्न हिंदी सॉफ्टवेयरों की खोज और उन पर कार्य करना। हिंदी एवं संस्कृत फॉन्ट्स, वेबसाइट्स की खोज।
भारतीय संस्कृति, जीवन दर्शन पर लेखन।
राजभाषा हिंदी का नवीन प्रौद्योगिकी से समंजस्य विषय पर कार्य।
हिन्दी अकादमी, दिल्ली के सहयोग से 'संस्कृति चिन्तन' पुस्तक प्रकाशित हुई है।
यह पुस्तक 'हिन्दी बुक सेन्टर, आसफ अली रोड, दरियागंज, दिल्ली से खरीदी जा सकती है।
‘अपने इतिहास की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए। धन तो आता जाता रहता है। धन की दृष्टि से कमजोर होने पर भी कोई नष्ट नहीं होता है परन्तु जिसका इतिहास नष्ट हो जाए वह वास्तव में ही नष्ट हो जाता है।’
भारतीय संस्कृति विश्व की आदि संस्कृति है। इसका हजारों और लाखों वर्षों का इतिहास है। प्राचीनकाल से ही यह अत्यन्त गौरवशाली तथा महान रही है। भारतीय संस्कृति की यात्रा अविरल है। काल के अनवरत प्रवाह में विश्व की अनेक संस्कृतियाँ काल-कवलित हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति का स्वरूप आज भी अविचल है। हमारी निरन्तरता, गतिशीलता एवं परिवर्तनशीलता के कारण ही आज विश्व की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृतियों में भारत की संस्कृति प्राचीन होते हुए भी नूतन कही जा सकती है। संस्कृति बहता हुआ जल है। परिवर्तन संसार का नियम है। स्थवर हो या जंगम, सभी परिवर्तन के नियम से बँधे हैं। कोई भी उससे अछूता नहीं है। हमारे मनीषियों ने इस सत्य को पहचाना और जो आवश्यक हुआ उसे ग्रहण किया, जो समय के साथ-साथ अनावश्यक हुआ उसे त्यागा। अच्छाई को ग्रहण करना बुराई को त्यागना यही हमारी संस्कृति की विशेषता रही है। भारतीय संस्कृति यद्यपि बहुत पुरातन है तथापि अद्यतन रूप में जीवन्त है। अनवरत चलायमान रहना एवं स्वयं को नवीन स्वरूप में परिभाषित करना, हम चिरन्तन संस्कृति का गुण है। यही गुण इसे परिवर्तित परिदृश्य में प्रासंगिक बनाते हैं। इसके मूल में जीवेत एवम् जीवयेत अर्थात जियो और जीने का सिद्धान्त विद्यमान है। - ललित भूषण
सुखी दांपत्य जीवन का मूल - विवाह के समय लिए गए सात वचन
विवाह समय पति द्वारा पत्नि को दिए जाने वाले सात वचनों के महत्व को देखते हुए यहाँ उन वचनों के बारे में कुछ जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ. 1.तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या: वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी! यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना. कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांती ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.) 2.पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या: वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !! (जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ) 3.जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !! (आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं(युवावस्था, प्रौढावस्था, वृ्द्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगें, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ) 4.कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या: वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !! (अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे. अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ती का दायित्व आपके कंधों पर है. यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ )
5.स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !! (अपने घर के कार्यों में,विवाहादि,लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ) 6.न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!! (यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगें. यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ) 7.परस्त्रियं मातृ्समां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !! (आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
काश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था काश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाई में फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में
वृतं यत्नेन संरक्षेत्, वित्तमायति यति च।
ReplyDeleteअक्षीणो वित्ततः क्षीणः, वृत्ततस्तु हतोहतः।।
- महाभारत
‘अपने इतिहास की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए। धन तो आता जाता रहता है। धन की दृष्टि से कमजोर होने पर भी कोई नष्ट नहीं होता है परन्तु जिसका इतिहास नष्ट हो जाए वह वास्तव में ही नष्ट हो जाता है।’
भारतीय संस्कृति विश्व की आदि संस्कृति है। इसका हजारों और लाखों वर्षों का इतिहास है। प्राचीनकाल से ही यह अत्यन्त गौरवशाली तथा महान रही है। भारतीय संस्कृति की यात्रा अविरल है। काल के अनवरत प्रवाह में विश्व की अनेक संस्कृतियाँ काल-कवलित हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति का स्वरूप आज भी अविचल है। हमारी निरन्तरता, गतिशीलता एवं परिवर्तनशीलता के कारण ही आज विश्व की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृतियों में भारत की संस्कृति प्राचीन होते हुए भी नूतन कही जा सकती है। संस्कृति बहता हुआ जल है। परिवर्तन संसार का नियम है। स्थवर हो या जंगम, सभी परिवर्तन के नियम से बँधे हैं। कोई भी उससे अछूता नहीं है। हमारे मनीषियों ने इस सत्य को पहचाना और जो आवश्यक हुआ उसे ग्रहण किया, जो समय के साथ-साथ अनावश्यक हुआ उसे त्यागा। अच्छाई को ग्रहण करना बुराई को त्यागना यही हमारी संस्कृति की विशेषता रही है। भारतीय संस्कृति यद्यपि बहुत पुरातन है तथापि अद्यतन रूप में जीवन्त है। अनवरत चलायमान रहना एवं स्वयं को नवीन स्वरूप में परिभाषित करना, हम चिरन्तन संस्कृति का गुण है। यही गुण इसे परिवर्तित परिदृश्य में प्रासंगिक बनाते हैं। इसके मूल में जीवेत एवम् जीवयेत अर्थात जियो और जीने का सिद्धान्त विद्यमान है।
- ललित भूषण
सुखी दांपत्य जीवन का मूल - विवाह के समय लिए गए सात वचन
ReplyDeleteविवाह समय पति द्वारा पत्नि को दिए जाने वाले सात वचनों के महत्व को देखते हुए यहाँ उन वचनों के बारे में कुछ जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ.
1.तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!
यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना. कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांती ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
2.पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
(जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
3.जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
(आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं(युवावस्था, प्रौढावस्था, वृ्द्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगें, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ)
4.कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!
(अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे. अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ती का दायित्व आपके कंधों पर है. यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ )
5.स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
(अपने घर के कार्यों में,विवाहादि,लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
6.न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!
(यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगें. यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
7.परस्त्रियं मातृ्समां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!
(आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
काश्मीर का दर्द
ReplyDeleteकाश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था
डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था
काश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था
जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था
काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था
काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था
काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाई में
फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में